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ग्रह दृष्टि तालिका

ग्रह-दृष्टि वैदिक ज्योतिष का मूल-तंत्र है — ग्रह जहाँ बैठा है वहीं नहीं, जहाँ "देखता" है वहाँ भी फल देता है। हर ग्रह अपने से सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।

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ग्रह दृष्टि तालिका के बारे में

तीन ग्रहों को विशेष दृष्टियाँ प्राप्त हैं: मंगल की 4थी और 8वीं, गुरु की 5वीं और 9वीं, शनि की 3री और 10वीं — सप्तम के अतिरिक्त। इसीलिए गुरु की दृष्टि को अमृत (जहाँ पड़े वहाँ रक्षा) और शनि की दृष्टि को कठोर शिक्षक कहा जाता है।

यह तालिका दो दृश्य देती है: कौन ग्रह किस ग्रह को देख रहा है (ग्रह-से-ग्रह मैट्रिक्स) और कौन ग्रह किन भावों को देख रहा है — पूरी दृष्टि-प्रणाली एक नज़र में।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्रह-दृष्टि क्या है?

ग्रह का अपनी स्थिति से अन्य भावों/ग्रहों पर प्रभाव-प्रक्षेपण। सभी ग्रह सप्तम को देखते हैं; मंगल (4, 8), गुरु (5, 9) और शनि (3, 10) को अतिरिक्त दृष्टियाँ प्राप्त हैं।

गुरु की दृष्टि विशेष क्यों मानी जाती है?

गुरु की 5-7-9 दृष्टियाँ शुभ-त्रिकोण बनाती हैं — जिस भाव/ग्रह पर पड़ें, वहाँ रक्षा और विस्तार देती हैं। कई दोषों का शास्त्रीय भंग "गुरु-दृष्टि" ही है।

क्या राहु-केतु की दृष्टि होती है?

परंपराएँ भिन्न हैं — कुछ इन्हें गुरु-समान (5, 7, 9) दृष्टि देती हैं, कुछ केवल युति-प्रभाव मानती हैं। यह तालिका मुख्य ग्रह-दृष्टियों के शास्त्रीय नियम से बनती है।

दृष्टि और युति में कौन प्रबल है?

युति (एक भाव में साथ) सबसे गहरा संबंध है; पूर्ण दृष्टि उससे कुछ कम पर स्पष्ट प्रभाव। फल-निर्णय में दोनों के साथ ग्रह की गरिमा भी जोड़ें।

इस तालिका का उपयोग कैसे करें?

किसी भाव का फल जाँचते समय देखें कि उस पर किन ग्रहों की दृष्टि है — शुभ दृष्टियाँ भाव को पोषण देती हैं, पाप दृष्टियाँ चुनौती। योग-भंग और दोष-परिहार की जाँच भी यहीं से शुरू होती है।